श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.7.12 
धात्र्यास्तु वचनं श्रुत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षित:।
कैलासशिखराकारात् प्रासादादवरोहत॥ १२॥
 
 
अनुवाद
धाय के ये वचन सुनकर कुब्जा व्याकुल हो गई और उस महल से तुरंत नीचे उतर आई, जो कैलाश शिखर के समान चमकीला और ऊँचा था॥12॥
 
On hearing these words of the nurse, Kubja became upset and immediately came down from that palace which was as bright as the peak of Kailash and towering high.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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