श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  2.7.10-11 
विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा।
आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघवे श्रियम्॥ १०॥
श्व: पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन चानघम्।
राजा दशरथो राममभिषेक्ता हि राघवम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
श्री राम की धाय को बहुत प्रसन्नता हुई, कुब्जा के पूछने पर उसने बड़े हर्ष के साथ बताया - 'कुब्जा! रघुनाथजी को अपार धन की प्राप्ति होने वाली है। कल महाराज दशरथ पुष्यनक्षत्र के संयोग में क्रोध को जीतने वाले और निष्पाप रघुकुलनन्दन श्री राम का युवराज पद पर अभिषेक करेंगे। 10-11॥
 
Shri Ram's nurse was overjoyed, when Kubja asked, she told him with great joy - 'Kubja! Raghunathji is going to get huge wealth. Tomorrow, Maharaj Dasharatha will anoint Raghukulnandan Shri Ram, the one who conquers anger and is sinless in the conjunction of Pushyanakshatra, as the crown prince. 10-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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