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ramayan 2.69.7-8: भरत ने अपने मित्र से इस प्रकार कहा, 'मित्र! मैं तुम्हें अपने दुःख का कारण बता रहा हूँ, सुनो। आज मैंने स्वप्न में अपने पिता को देखा। उनका मुख मलिन था, उनके बाल बिखरे हुए थे और वे पर्वत की चोटी से गोबर से भरे एक गंदे गड्ढे में गिर पड़े थे।'   |   ramayan सर्ग 2.69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  2.69.7-8 
एवं ब्रुवाणं सुहृदं भरत: प्रत्युवाच ह।
शृणु त्वं यन्निमित्तं मे दैन्यमेतदुपागतम्॥ ७॥
स्वप्ने पितरमद्राक्षं मलिनं मुक्तमूर्धजम्।
पतन्तमद्रिशिखरात् कलुषे गोमये ह्रदे॥ ८॥
 
 
अनुवाद
भरत ने अपने मित्र से इस प्रकार कहा, 'मित्र! मैं तुम्हें अपने दुःख का कारण बता रहा हूँ, सुनो। आज मैंने स्वप्न में अपने पिता को देखा। उनका मुख मलिन था, उनके बाल बिखरे हुए थे और वे पर्वत की चोटी से गोबर से भरे एक गंदे गड्ढे में गिर पड़े थे।'
 
Bharata replied to his friend in this manner, 'Friend! I am telling you the reason for my misery, listen. I saw my father in my dream today. His face was dirty; his hair was loose and he had fallen from the top of the mountain into a dirty pit filled with cow dung. 7-8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)