श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.69.4 
वादयन्ति तदा शान्तिं लासयन्त्यपि चापरे।
नाटकान्यपरे स्माहुर्हास्यानि विविधानि च॥ ४॥
 
 
अनुवाद
कुछ लोग वीणा वगैरह बजाने लगे। कुछ लोग अपने दुःख को शांत करने के लिए नृत्य-नाटिकाओं का आयोजन करने लगे। कुछ मित्रों ने हास्य-व्यंग्य पर आधारित नाट्य-नाट्यों का आयोजन किया।
 
Some people started playing the Veena etc. Others started organising dances to calm their grief. Other friends organised various types of plays in which humour was the main theme.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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