|
| |
| |
श्लोक 2.69.21  |
इमां च दु:स्वप्नगतिं निशम्य हि
त्वनेकरूपामवितर्कितां पुरा।
भयं महत् तुद् हृदयान्न याति मे
विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम्॥ २१॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| 'इतने सारे दुःस्वप्न देखकर, जिनके विषय में मैंने पहले कभी सोचा भी नहीं था, तथा महाराज को ऐसे रूप में देखकर, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, इस विचार से मेरे हृदय का महान भय दूर नहीं हो रहा है।' |
| |
| 'Having seen so many nightmares about which I had never even thought before and having seen Maharaj in such a form which I had never imagined, the great fear in my heart is not going away because of this thought.' |
| |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनसप्ततितम: सर्ग:॥ ६९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९॥ |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|