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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  2.69.18-19 
नरो यानेन य: स्वप्ने खरयुक्तेन याति हि।
अचिरात्तस्य धूम्राग्रं चितायां सम्प्रदृश्यते॥ १८॥
एतन्निमित्तं दीनोऽहं न वच: प्रतिपूजये।
शुष्यतीव च मे कण्ठो न स्वस्थमिव मे मन:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'जो व्यक्ति स्वप्न में गधे द्वारा खींचे गए रथ पर यात्रा करता हुआ दिखाई देता है, उसकी चिता का धुआँ शीघ्र ही दिखाई देता है। इसी कारण मैं दुःखी हो रहा हूँ और आप लोगों की बातों का सम्मान नहीं करता। मेरा गला सूख रहा है और मन अस्वस्थ हो रहा है।
 
'The man who is seen travelling in a chariot drawn by a donkey in his dreams, his funeral pyre's smoke is soon seen. This is the reason why I am feeling sad and I do not respect what you people say. My throat is getting dry and my mind is getting unwell.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)