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ramayan 2.69.12: राजा के हाथी के दाँत टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं और जो अग्नि प्रज्वलित हो रही थी, वह अचानक बुझ गई है॥12॥   |   ramayan सर्ग 2.69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.69.12 
औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम्।
सहसा चापि संशान्ता ज्वलिता जातवेदस:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
राजा के हाथी के दाँत टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं और जो अग्नि प्रज्वलित हो रही थी, वह अचानक बुझ गई है॥12॥
 
'The tusk of the King's elephant has been broken into pieces and the fire that was blazing brightly has suddenly gone out.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)