श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.69.11 
स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भुवि।
उपरुद्धां च जगतीं तमसेव समावृताम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'मैंने स्वप्न में भी देखा कि समुद्र सूख गया है, चन्द्रमा पृथ्वी पर गिर पड़ा है, तथा सम्पूर्ण पृथ्वी व्याकुल हो गई है और अंधकार से आच्छादित हो गई है॥11॥
 
'In my dream I also saw that the ocean had dried up, the moon had fallen on the earth, and the entire earth was afflicted with turmoil and covered with darkness.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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