श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 69: भरत की चिन्ता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.69.10 
ततस्तिलोदनं भुक्त्वा पुन: पुनरध:शिरा:।
तैलेनाभ्यक्तसर्वाङ्गस्तैलमेवान्वगाहत॥ १०॥
 
 
अनुवाद
फिर उसने तिल और चावल खाए। इसके बाद उसके सारे शरीर पर तेल लगाया गया और फिर वह सिर झुकाकर तेल में डुबकियाँ लगाने लगा॥10॥
 
‘Then he ate sesame seeds and rice. After this, oil was applied to his whole body and then he started taking dips in the oil with his head bent down.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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