श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 67: मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.67.37 
जीवत्यपि महाराजे तवैव वचनं वयम्।
नातिक्रमामहे सर्वे बेलां प्राप्येव सागर:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
'वशिष्ठजी! जैसे उफनता हुआ समुद्र किनारे पहुँचकर आगे नहीं बढ़ता, वैसे ही राजा के जीवन काल में भी हम सबने केवल आपके वचनों का उल्लंघन नहीं किया॥37॥
 
'Vaashishthaji! Just as a surging ocean does not proceed further after reaching its shore, similarly, even during the lifetime of the king we all did not violate only your words.॥ 37॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas