श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 67: मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.67.35 
यमो वैश्रवण: शक्रो वरुणश्च महाबल:।
विशिष्यन्ते नरेन्द्रेण वृत्तेन महता तत:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
‘राजा अपने उत्तम चरित्र से यम, कुबेर, इन्द्र और महाबली वरुण से भी बढ़कर है। (यमराज केवल दण्ड देते हैं, कुबेर केवल धन देते हैं, इन्द्र केवल पालन-पोषण करते हैं और वरुण केवल सदाचार का नियंत्रण करते हैं; परन्तु श्रेष्ठ राजा में ये चारों गुण विद्यमान रहते हैं। अतः वह इनसे भी बढ़कर है)॥35॥
 
‘The king by his great character surpasses even Yama, Kubera, Indra and the mighty Varuna (Yamaraja only punishes, Kubera only gives wealth, Indra only nurtures and Varuna only controls good conduct; but in a great king all these four qualities are present. Hence he surpasses them)॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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