श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 67: मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.67.33 
यथा दृष्टि: शरीरस्य नित्यमेव प्रवर्तते।
तथा नरेन्द्रो राष्ट्रस्य प्रभव: सत्यधर्मयो:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे दृष्टि सदैव शरीर के कल्याण की ओर ही रहती है, वैसे ही राजा राज्य के भीतर सत्य और धर्म का प्रवर्तक होता है ॥ 33॥
 
‘Just as the vision is always inclined towards the welfare of the body, similarly the king is the promoter of truth and righteousness within the kingdom.॥ 33॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas