श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 67: मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.67.32 
ये हि सम्भिन्नमर्यादा नास्तिकाश्छिन्नसंशया:।
तेऽपि भावाय कल्पन्ते राजदण्डनिपीडिता:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
‘जो नास्तिक लोग पहले राजदण्ड से पीड़ित होकर वेदों की मर्यादा और अपनी जातियों के लिए निर्धारित वर्णाश्रम को भंग करते थे, वे अब राजा की अनुपस्थिति में निर्भय होकर अपना प्रभुत्व दिखाएंगे॥ 32॥
 
‘The atheist people who earlier used to be oppressed by the royal punishment and used to break the decorum of the Vedas and the Varnashram prescribed for their castes, will now fearlessly show their supremacy in the absence of the king.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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