श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 67: मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.67.31 
नाराजके जनपदे स्वकं भवति कस्यचित्।
मत्स्या इव जना नित्यं भक्षयन्ति परस्परम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
राजा के अभाव में राज्य में कोई भी व्यक्ति अपनी कोई संपत्ति नहीं रख सकता। जैसे मछलियाँ एक-दूसरे को खाती हैं, वैसे ही अराजक देश में लोग सदैव एक-दूसरे को खाते, लूटते और लूटते रहते हैं।॥31॥
 
‘In the absence of a king, no person in the kingdom can retain any possession of his own. Just as fish eat each other, similarly, in a chaotic country, people always eat, plunder and plunder each other.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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