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श्लोक 2.67.29  |
यथा ह्यनुदका नद्यो यथा वाप्यतृणं वनम्।
अगोपाला यथा गावस्तथा राष्ट्रमराजकम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे जल के बिना नदियाँ, घास के बिना वन और ग्वाल-बालों के बिना गायें सुन्दर नहीं होतीं, वैसे ही राजा के बिना राज्य सुन्दर नहीं होता॥ 29॥ |
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| ‘Just as rivers without water, forests without grass and cows without cowherds are not beautiful, similarly a kingdom is not beautiful without a king.॥ 29॥ |
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