श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 67: मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.67.25 
नाराजके जनपदे हृष्टै: परमवाजिभि:।
नरा: संयान्ति सहसा रथैश्च प्रतिमण्डिता:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'राजाविहीन राज्य में लोग वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित होकर, मजबूत, अच्छे घोड़ों और रथों पर सवार होकर अचानक यात्रा नहीं करते (क्योंकि उन्हें हमेशा लुटेरों का भय बना रहता है)।
 
'In a kingdom without a king, people do not suddenly travel, decked out in clothes and ornaments, on sturdy, fine horses and chariots (because they are always in fear of robbers).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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