श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 67: मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मन्त्रियों का राजा के बिना होने वाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठजी से किसी को राजा बनाने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.67.1 
आक्रन्दिता निरानन्दा सास्रकण्ठजनाविला।
अयोध्यायामवतता सा व्यतीयाय शर्वरी॥ १॥
 
 
अनुवाद
अयोध्यावासियों ने वह रात रोते-विलाप करते हुए बिताई। उसमें कोई हर्ष नहीं था। सबके कण्ठ आँसुओं से भर गए थे। दुःख के कारण वह रात सबको बहुत लंबी लग रही थी॥1॥
 
The people of Ayodhya spent that night weeping and mourning. There was no joy in it. Everyone's throats were filled with tears. That night seemed very long to everyone because of their sorrow.॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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