श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 66: राजा के लिये कौसल्या का विलाप और कैकेयी की भर्त्सना, मन्त्रियों का राजा के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में सुलाना, पुरी की श्रीहीनता और पुरवासियों का शोक  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.66.7 
अनियोगे नियुक्तेन राज्ञा रामं विवासितम्।
सभार्यं जनक: श्रुत्वा परितप्स्यत्यहं यथा॥ ७॥
 
 
अनुवाद
‘कैकेयी ने राजा को अयोग्य कार्य में लगाकर श्री राम और उनकी पत्नी को वनवास दिलवा दिया। जब राजा जनक यह समाचार सुनेंगे, तो वे भी मेरी तरह बहुत दुःखी होंगे।॥7॥
 
‘Kaikeyi engaged the king in unworthy work and got Shri Ram and his wife exiled by him. When King Janak will hear this news, he will be very sad like me.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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