श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 66: राजा के लिये कौसल्या का विलाप और कैकेयी की भर्त्सना, मन्त्रियों का राजा के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में सुलाना, पुरी की श्रीहीनता और पुरवासियों का शोक  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.66.3 
सकामा भव कैकेयी भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम्।
त्यक्त्वा राजानमेकाग्रा नृशंसे दुष्टचारिणि॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'दुष्ट और क्रूर कैकेयी! देख, तेरी मनोकामना पूरी हो गई। अब राजा का त्याग कर और बिना किसी बाधा के अपने राज्य का भोग करने में लग जा।'
 
'Wicked and cruel Kaikeyi! See, your wish has been fulfilled. Now abandon the king and concentrate on enjoying your kingdom without any hindrance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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