श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 66: राजा के लिये कौसल्या का विलाप और कैकेयी की भर्त्सना, मन्त्रियों का राजा के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में सुलाना, पुरी की श्रीहीनता और पुरवासियों का शोक  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.66.28 
गतप्रभा द्यौरिव भास्करं विना
व्यपेतनक्षत्रगणेव शर्वरी।
पुरी बभासे रहिता महात्मना
कण्ठास्रकण्ठाकुलमार्गचत्वरा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जैसे सूर्य के बिना आकाश और तारों के बिना रात्रि, वैसे ही अयोध्या महाराज दशरथ के बिना सूनी प्रतीत हो रही थी। आँसुओं से रुँधे हुए लोगों की भीड़ उसके मार्गों और चौराहों पर जमा हो गई थी॥ 28॥
 
Like the sky without the sun and the night without stars, Ayodhya appeared destitute of the great king Dasharath. Crowds of people with their throats choked with tears had gathered on its streets and crossings.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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