श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 66: राजा के लिये कौसल्या का विलाप और कैकेयी की भर्त्सना, मन्त्रियों का राजा के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में सुलाना, पुरी की श्रीहीनता और पुरवासियों का शोक  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.66.21 
त्वया तेन च वीरेण विना व्यसनमोहिता:।
कथं वयं निवत्स्याम: कैकेय्या च विदूषिता:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'वीर श्री राम और आपके वियोग में हम पर बड़ी विपत्ति आ पड़ी है, जिससे हम निराश हो रहे हैं। अब अपनी सहधर्मिणी कैकेयी के द्वारा अपमानित होकर मैं यहाँ कैसे रह सकूँगा?॥ 21॥
 
'Due to the absence of the brave Sri Rama and you, a great calamity has fallen on us, due to which we are getting disillusioned. Now, being insulted by my co-wife Kaikeyi, how will I be able to stay here?॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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