श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 66: राजा के लिये कौसल्या का विलाप और कैकेयी की भर्त्सना, मन्त्रियों का राजा के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में सुलाना, पुरी की श्रीहीनता और पुरवासियों का शोक  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.66.12 
साहमद्यैव दिष्टान्तं गमिष्यामि पतिव्रता।
इदं शरीरमालिङ्गॺ प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'मैं भी आज मृत्यु का आलिंगन करूँगी। पतिव्रता स्त्री की भाँति अपने पति के शरीर का आलिंगन करूँगी और चिता की अग्नि में प्रविष्ट हो जाऊँगी।'॥12॥
 
'I too shall embrace death today. Like a faithful wife, I shall embrace my husband's body and enter the fire of the funeral pyre.'॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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