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श्लोक 2.64.78  |
तथा तु दीन: कथयन् नराधिप:
प्रियस्य पुत्रस्य विवासनातुर:।
गतेऽर्धरात्रे भृशदु:खपीडित-
स्तदा जहौ प्राणमुदारदर्शन:॥ ७८॥ |
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| अनुवाद |
| अपने प्रिय पुत्र के वनवास से दुःखी राजा दशरथ ये करुण वचन कहते हुए आधी रात बीतते-बीतते महान शोक से ग्रस्त हो गये और उसी क्षण उन उदार राजा ने अपने प्राण त्याग दिये। |
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| King Dasaratha, grieved by the exile of his beloved son, uttering these pitiful words, became afflicted with great sorrow by the time midnight passed, and at that very moment the magnanimous king gave up his life. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतु:षष्टितम: सर्ग:॥ ६४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥ |
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