श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.64.58 
तदेतच्चिन्तयानेन स्मृतं पापं मया स्वयम्।
तदा बाल्यात् कृतं देवि शब्दवेध्यनुकर्षिणा॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
'देवि! मैंने अपने बाल स्वभाव के कारण ही ऋषि को पहले शब्दभेदी बाण से मारकर और फिर उसके शरीर से बाण निकालकर उनकी हत्या का पाप किया था। आज जब मैं अपने पुत्र के वियोग में व्याकुल हूँ, तब मुझे स्वयं ही उसकी याद आ गई है।॥58॥
 
'Devi! Due to my childish nature, I had committed the sin of killing the sage by first shooting him with an arrow piercing his words and then pulling out the arrow from his body. Today, when I am worried about the separation from my son, I myself have remembered it. ॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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