श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.64.50 
एवमुक्त्वा तु दिव्येन विमानेन वपुष्मता।
आरुरोह दिवं क्षिप्रं मुनिपुत्रो जितेन्द्रिय:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
'ऐसा कहकर अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाले ऋषिपुत्र उस सुन्दर आकार वाले दिव्य विमान पर सवार होकर शीघ्र ही स्वर्गलोक के लिए चले गये।
 
'Having said this the son of the sage who had controlled his senses quickly departed for the heavenly abode in that beautifully shaped divine aircraft.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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