श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.64.38 
ततो वैवस्वतं दृष्ट्वा तं प्रवक्ष्यामि भारतीम्।
क्षमतां धर्मराजो मे बिभृयात् पितरावयम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् मैं सूर्यपुत्र यमराज को देखकर उनसे यह कहूँगी - धर्मराज, आप मेरे अपराध को क्षमा करके मेरे पुत्र को छोड़ दीजिए, जिससे वह अपने माता-पिता का भरण-पोषण कर सके ॥38॥
 
"Thereafter, after seeing Yamaraja, the son of the Sun, I will tell him this - Dharmaraja, please forgive my crime and release my son, so that he can support his parents. ॥ 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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