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श्लोक 2.64.17  |
ततस्तस्यैव वचनादुपेत्य परितप्यत:।
स मया सहसा बाण उद्धृतो मर्मतस्तदा॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| "उस बाण के कारण उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी, इसलिए उसके कहने पर मैंने सहसा ही उसके मूलस्थान से वह बाण निकाल दिया॥17॥ |
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| "He was in great pain due to that arrow, so at his request I suddenly removed that arrow from his vital spot.॥ 17॥ |
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