श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.64.11 
मुनिमव्यक्तया वाचा तमहं सज्जमानया।
हीनव्यञ्जनया प्रेक्ष्य भीतचित्त इवाब्रुवम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'मुनि को देखते ही मैं भय से भर गया। मेरी जीभ लड़खड़ाने लगी। मैं अनेक अक्षरों का उच्चारण नहीं कर सका। अतः मैंने अस्पष्ट वाणी से बोलने का प्रयत्न किया।॥11॥
 
‘As soon as I saw the sage, I was filled with fear. My tongue began to falter. I could not pronounce many letters. Thus I tried to speak in unclear voice.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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