श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 64: राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनि कुमार के वध से दुःखी हुए उनके मातापिता के विलाप और उनके दिये हुए शाप का प्रसंग सुनाकर अपने प्राणों को त्याग देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.64.10 
त्वं गतिस्त्वगतीनां च चक्षुस्त्वं हीनचक्षुषाम्।
समासक्तास्त्वयि प्राणा: कथं त्वं नाभिभाषसे॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हम असहाय हैं, आप ही हमारे एकमात्र सहायक हैं। हम अंधे हैं, आप ही हमारी आँखें हैं। हमारे प्राण आपमें अटके हुए हैं। मुझे बताइए, आप क्यों नहीं बोलते?॥10॥
 
‘We are helpless, you are our only helper. We are blind, you are our eyes. Our lives are stuck in you. Tell me, why are you not speaking?’॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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