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ramayan 2.63.45-46h: हे राजन! इस बाण को मेरे शरीर से निकाल दीजिए। यह तीक्ष्ण बाण मेरे प्राणस्थान पर उसी प्रकार चोट कर रहा है, जैसे नदी के जल का वेग उसके ऊँचे, कोमल रेतीले किनारों को छिन्न-भिन्न कर देता है। ॥45 1/2॥   |   ramayan सर्ग 2.63: राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसङ्ग सुनाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 63: राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसङ्ग सुनाना  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  2.63.45-46h 
विशल्यं कुरु मां राजन् मर्म मे निशित: शर:॥ ४५॥
रुणद्धि मृदु सोत्सेधं तीरमम्बुरयो यथा।
 
 
अनुवाद
हे राजन! इस बाण को मेरे शरीर से निकाल दीजिए। यह तीक्ष्ण बाण मेरे प्राणस्थान पर उसी प्रकार चोट कर रहा है, जैसे नदी के जल का वेग उसके ऊँचे, कोमल रेतीले किनारों को छिन्न-भिन्न कर देता है। ॥45 1/2॥
 
"O King! Remove this arrow from my body. This sharp arrow is hurting my vital spot in the same way as the force of the river water shatters its high soft sandy banks." ॥ 45 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)