श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 63: राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसङ्ग सुनाना  »  श्लोक 44-45h
 
 
श्लोक  2.63.44-45h 
इयमेकपदी राजन् यतो मे पितुराश्रम:॥ ४४॥
तं प्रसादय गत्वा त्वं न त्वा संकुपित: शपेत्।
 
 
अनुवाद
"हे राजन! यह मार्ग वहाँ जाता है जहाँ मेरे पिता का आश्रम है। तुम वहाँ जाकर उन्हें प्रसन्न करो, जिससे वे क्रोधित होकर तुम्हें शाप न दें।"
 
"O King! This path leads to the place where my father's ashram is. You go and please him so that he does not get angry and curse you. 44 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)