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श्लोक  2.63.34-35h 
तस्याहं करुणं श्रुत्वा ऋषेर्विलपतो निशि॥ ३४॥
सम्भ्रान्त: शोकवेगेन भृशमासं विचेतन:।
 
 
अनुवाद
रात्रि में विलाप करते हुए ऋषि के दुःख भरे शब्द सुनकर मैं शोक से भयभीत हो गया। मेरी चेतना पूरी तरह लुप्त होने लगी।
 
'Hearing the sad words of the wailing sage at night, I was terrified with grief. My consciousness began to fade away completely. 34 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)