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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 63: राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनि कुमार के मारे जाने का प्रसङ्ग सुनाना  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  2.63.33-34h 
तां गिरं करुणं श्रुत्वा मम धर्मानुकांक्षिण:॥ ३३॥
कराभ्यां सशरं चापं व्यथितस्यापतद् भुवि।
 
 
अनुवाद
'ये करुणा भरे शब्द सुनकर मेरे हृदय में बड़ी पीड़ा हुई। एक ओर तो मैं धर्म का उपासक था और दूसरी ओर यह अधर्म का कार्य हो गया। उस समय मेरे हाथ से धनुष-बाण छूटकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
 
'Hearing these words of compassion, I felt great pain in my heart. On one hand, I was a devotee of Dharma and on the other hand, this became an act of Adharma. At that time, the bow and arrow fell from my hands and fell on the earth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)