श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 62: दुःखी हुए राजा दशरथ का कौसल्या को हाथ जोड़कर मनाना और कौसल्या का उनके चरणों में पड़कर क्षमा माँगना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.62.9 
सा त्वं धर्मपरा नित्यं दृष्टलोकपरावरा।
नार्हसे विप्रियं वक्तुं दु:खितापि सुदु:खितम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
‘आप सदैव धर्म में तत्पर रहते हैं और संसार में भले-बुरे का भेद समझते हैं। यद्यपि आप दुःखी हैं, तथापि मैं भी महान दुःख में हूँ, अतः आपको मुझसे कठोर वचन नहीं कहने चाहिए।’॥9॥
 
‘You are always devoted to Dharma and understand the difference between good and bad in the world. Although you are sad, I am also in great sorrow, so you should not say harsh words to me.’॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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