श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 62: दुःखी हुए राजा दशरथ का कौसल्या को हाथ जोड़कर मनाना और कौसल्या का उनके चरणों में पड़कर क्षमा माँगना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.62.18 
तं हि चिन्तयमानाया: शोकोऽयं हृदि वर्धते।
नदीनामिव वेगेन समुद्रसलिलं महत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'मेरे हृदय में यह दुःख श्री रामजी के चिन्तन से ही बढ़ता है, जैसे नदियों के वेग से समुद्र का जल बढ़ता है।'॥18॥
 
'This sorrow in my heart increases due to thinking of Sri Rama only, just as the water of the ocean increases due to the force of the rivers.'॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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