श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 62: दुःखी हुए राजा दशरथ का कौसल्या को हाथ जोड़कर मनाना और कौसल्या का उनके चरणों में पड़कर क्षमा माँगना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.62.13 
नैषा हि सा स्त्री भवति श्लाघनीयेन धीमता।
उभयोर्लोकयोर्लोके पत्या या सम्प्रसाद्यते॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पति अपनी पत्नी के लिए इस लोक में भी और परलोक में भी वांछनीय है। इस लोक में जो स्त्री बुद्धिमान पति के द्वारा अनुनयित हो जाती है, वह उत्तम कुल की स्त्री कहलाने के योग्य नहीं है॥13॥
 
‘A husband is desirable for his wife in this world as well as in the next. A woman in this world who is persuaded by her wise husband is not worthy of being called a woman of good family.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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