श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 61: कौसल्या का विलाप पूर्वक राजा दशरथ को उपालम्भ देना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.61.8 
पद्मवर्णं सुकेशान्तं पद्मनि:श्वासमुत्तमम्।
कदा द्रक्ष्यामि रामस्य वदनं पुष्करेक्षणम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'मैं श्री रामजी के उस मनोहर मुख को कब देख सकूँगा, जिसकी कांति कमल के समान है, जिसके सुंदर केश उसे शोभा देते हैं, जिसके प्रत्येक श्वास से कमल की सुगंध आती है और जिसके खिले हुए कमल के समान सुंदर नेत्र सुशोभित हैं?॥ 8॥
 
'When will I be able to see that charming face of Shri Ram whose radiance is like that of the lotus, whose beautiful hair adorns him, whose every breath emanates the fragrance of the lotus and whose beautiful eyes like the bloomed lotus are adorned?॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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