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श्लोक 2.61.27  |
इमां गिरं दारुणशब्दसंहितां
निशम्य रामेति मुमोह दु:खित:।
तत: स शोकं प्रविवेश पार्थिव:
स्वदुष्कृतं चापि पुनस्तथास्मरत्॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| कौशल्या के कठोर वचन सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त दुःखी हुए। वे 'हे राम!' कहकर मूर्छित हो गए। राजा शोक में डूब गए। तभी उन्हें उसी क्षण अपना एक पुराना कुकर्म स्मरण हो आया, जिसके कारण उन्हें यह दुःख भोगना पड़ा॥ 27॥ |
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| King Dasharath was very saddened to hear Kausalya's harsh words. He fainted saying 'Oh Lord Rama!'. The king was drowned in grief. Then at that very moment he remembered one of his old misdeeds, due to which he had to suffer this sorrow.॥ 27॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकषष्टितम: सर्ग:॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६१॥ |
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