श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 61: कौसल्या का विलाप पूर्वक राजा दशरथ को उपालम्भ देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.61.25 
तत्र त्वं मम नैवासि रामश्च वनमाहित:।
न वनं गन्तुमिच्छामि सर्वथा हा हता त्वया॥ २५॥
 
 
अनुवाद
‘इन आधारों में से तू मेरा बिल्कुल भी नहीं है (क्योंकि तू मेरी सहधर्मिणी के वश में है)। दूसरा आधार तो श्री राम हैं, जिन्हें वन में भेज दिया गया है (और मेरे स्वजन भी दूर हैं। अतः तीसरा आधार भी नहीं रहा)। मैं तेरी सेवा छोड़कर वन में श्री राम के पास जाना नहीं चाहता, इसीलिए मैं तेरे द्वारा सर्वथा मारा गया हूँ॥ 25॥
 
‘Out of these supports, you are not mine at all (because you are under the control of my co-wife). The second support is Shri Ram, who has been sent to the forest (and my relatives are also far away. Hence the third support is also no more). I do not want to leave your service and go to Shri Ram in the forest, that is why I have been completely killed by you.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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