श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 61: कौसल्या का विलाप पूर्वक राजा दशरथ को उपालम्भ देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.61.18 
तथा ह्यात्तमिदं राज्यं हृतसारां सुरामिव।
नाभिमन्तुमलं रामो नष्टसोममिवाध्वरम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'इसी प्रकार शून्य सुरा और भुक्तवशिष्य यज्ञ के सम्बन्ध में सोमरस के समान दुःख की यह स्थिति श्री राम स्वीकार नहीं कर सकते ॥18॥
 
'Similarly, Shri Ram cannot accept this state of suffering like Somra in relation to the void Sura and Bhuktavashish Yagya. 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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