श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 61: कौसल्या का विलाप पूर्वक राजा दशरथ को उपालम्भ देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.61.17 
हविराज्यं पुरोडाश: कुशा यूपाश्च खादिरा:।
नैतानि यातयामानि कुर्वन्ति पुनरध्वरे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हविष्य, घृत, पुरोडाश, कुश और खदिर (खैर) के यौगिक - यज्ञ में प्रयुक्त होने पर 'यतयाम्' (भस्म) हो जाते हैं; इसीलिए विद्वान् लोग इन्हें अन्य यज्ञों में पुनः प्रयुक्त नहीं करते ॥17॥
 
The compounds of 'Havishya, Ghrit, Purodash, Kush and Khadir (well) - when used in a Yagya, become 'Yatayam' (consumed); That is why scholars do not use them again in other yagyas. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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