श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 6: सीता सहित श्रीराम का नियम परायण होना, हर्ष में भरे पुरवासियों द्वारा नगर की सजावट  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.6.23 
अनुद्धतमना विद्वान् धर्मात्मा भ्रातृवत्सल:।
यथा च भ्रातृषु स्निग्धस्तथास्मास्वपि राघव:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
श्री राम का मन कभी अहंकारी नहीं होता। वे विद्वान, गुणवान और अपने भाइयों के प्रति स्नेही हैं। जैसा स्नेह उन्हें अपने भाइयों के लिए है, वैसा ही स्नेह हमें भी है।
 
‘Shri Ram's mind is never arrogant. He is learned, virtuous and affectionate towards his brothers. The affection he has for his brothers is the same for us as well.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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