श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 59: सुमन्त्र द्वारा श्रीराम के शोक से जडचेतन एवं अयोध्यापुरी की दुरवस्था का वर्णन तथा राजा दशरथ का विलाप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.59.20 
भवितव्यतया नूनमिदं वा व्यसनं महत्।
कुलस्यास्य विनाशाय प्राप्तं सूत यदृच्छया॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'सुमन्त्र! प्रतिज्ञा करते हुए भी यह भारी विपत्ति इस कुल का नाश करने के लिए अवश्य ही अचानक आ पड़ी है। 20॥
 
'Sumantra! Despite the promise, this huge calamity has definitely come suddenly to destroy this clan. 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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