श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 59: सुमन्त्र द्वारा श्रीराम के शोक से जडचेतन एवं अयोध्यापुरी की दुरवस्था का वर्णन तथा राजा दशरथ का विलाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.59.19 
न सुहृद्भिर्न चामात्यैर्मन्त्रयित्वा सनैगमै:।
मयायमर्थ: सम्मोहात् स्त्रीहेतो: सहसा कृत:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'मैंने अपने मित्रों, मंत्रियों और वेदों के विशेषज्ञों से परामर्श किए बिना, केवल एक स्त्री की वासना को संतुष्ट करने के लिए, अचानक कामातुर होकर यह विनाशकारी कार्य किया है।
 
'Without consulting my friends, ministers and experts of the Vedas, I have suddenly committed this disastrous act out of passion, only to satisfy the desire of a woman.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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