श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 59: सुमन्त्र द्वारा श्रीराम के शोक से जडचेतन एवं अयोध्यापुरी की दुरवस्था का वर्णन तथा राजा दशरथ का विलाप  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.59.18 
कैकेय्या विनियुक्तेन पापाभिजनभावया।
मया न मन्त्रकुशलैर्वृद्धै: सह समर्थितम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'सुत! पापी कुल में, पापभूमि में जन्मी तथा पाप से परिपूर्ण विचारों वाली कैकेयी के प्रभाव में आकर मैंने इस विषय में उन वृद्धजनों से भी चर्चा नहीं की जो परामर्श देने में कुशल हैं॥18॥
 
'Sut! I was influenced by Kaikeyi who was born in a sinful family and in a sinful land and whose thoughts are also full of sins, and did not even discuss this matter with the elders who are skilled in giving advice.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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