श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 59: सुमन्त्र द्वारा श्रीराम के शोक से जडचेतन एवं अयोध्यापुरी की दुरवस्था का वर्णन तथा राजा दशरथ का विलाप  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.59.14 
नामित्राणां न मित्राणामुदासीनजनस्य च।
अहमार्ततया कंचिद् विशेषं नोपलक्षये॥ १४॥
 
 
अनुवाद
‘मैंने शत्रु, मित्र और उदासीन लोगों को समान रूप से दुःखी देखा है। मैंने किसी के दुःख में कोई अंतर नहीं देखा है।॥14॥
 
‘I have seen enemies, friends and indifferent people equally sad. I have not seen any difference in the grief of anyone.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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