श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 57: सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना, उनके मुख से श्रीराम का संदेश सुनकर पुरवासियों का विलाप, राजा दशरथ और कौसल्या की मूर्छा तथा अन्तःपुर की रानियों का आर्तनाद  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.57.6 
स शून्यामिव नि:शब्दां दृष्ट्वा परमदुर्मना:।
सुमन्त्रश्चिन्तयामास शोकवेगसमाहत:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वहाँ एक शब्द भी सुनाई नहीं देता था। सारा नगर ऐसा मौन था, मानो वह लोगों से शून्य हो गया हो। अयोध्या की ऐसी दशा देखकर सुमन्तराम को बड़ा दुःख हुआ। शोक से पीड़ित होकर वे इस प्रकार चिंता करने लगे-॥6॥
 
Not a single word could be heard there. The whole city was so silent, as if it had become empty of people. Seeing such a state of Ayodhya, Sumantram felt very sad. Afflicted with grief, he started worrying in this manner -॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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