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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 57: सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना, उनके मुख से श्रीराम का संदेश सुनकर पुरवासियों का विलाप, राजा दशरथ और कौसल्या की मूर्छा तथा अन्तःपुर की रानियों का आर्तनाद
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श्लोक 5
श्लोक
2.57.5
तत: सायाह्नसमये द्वितीयेऽहनि सारथि:।
अयोध्यां समनुप्राप्य निरानन्दां ददर्श ह॥ ५॥
अनुवाद
श्रृंगवेरपुर से लौटकर दूसरे दिन सायंकाल अयोध्या पहुँचने पर उन्होंने देखा कि सारा नगर हर्षविहीन हो गया है ॥5॥
On his return from Shringaverpur, on reaching Ayodhya in the evening of the next day he saw that the whole city had become devoid of joy. ॥5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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