श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 57: सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना, उनके मुख से श्रीराम का संदेश सुनकर पुरवासियों का विलाप, राजा दशरथ और कौसल्या की मूर्छा तथा अन्तःपुर की रानियों का आर्तनाद  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.57.29 
इमं तस्य महाभाग दूतं दुष्करकारिण:।
वनवासादनुप्राप्तं कस्मान्न प्रतिभाषसे॥ २९॥
 
 
अनुवाद
हे महामुने! ये कठिन कार्य करने वाले सुमन्त्रजी श्री राम के दूत बनकर वनवास से उनका सन्देश लेकर लौटे हैं। आप उनसे बात क्यों नहीं करते?॥ 29॥
 
‘O great one! This Sumantraji, who performs difficult tasks, has returned from exile as a messenger of Shri Ram, carrying his message. Why don't you talk to him?॥ 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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