श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 57: सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना, उनके मुख से श्रीराम का संदेश सुनकर पुरवासियों का विलाप, राजा दशरथ और कौसल्या की मूर्छा तथा अन्तःपुर की रानियों का आर्तनाद  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.57.13 
दानयज्ञविवाहेषु समाजेषु महत्सु च।
न द्रक्ष्याम: पुनर्जातु धार्मिकं राममन्तरा॥ १३॥
 
 
अनुवाद
अब हम दान, यज्ञ, विवाह तथा प्रमुख सामाजिक कार्यों के समय अपने मध्य खड़े हुए पुण्यात्मा श्री राम को कभी नहीं देख सकेंगे॥13॥
 
‘Now we will never be able to see the virtuous Sri Ram standing amongst us at the time of charity, sacrifices, marriages and major social functions.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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